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गौरेला पेंड्रा मरवाही – प्रमाण पत्र की आड़ में दबेगा मामला या खुलेंगे शिक्षा व्यवस्था के राज ?”

“गौरेला पेंड्रा मरवाही – प्रमाण पत्र की आड़ में दबेगा मामला या खुलेंगे शिक्षा व्यवस्था के राज ?”

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। जिले में प्रभारी हॉस्टल अधीक्षकों के वेतन भुगतान से पहले मूल संस्था से उपस्थिति प्रमाण पत्र लेने के आदेश के बाद शिक्षा विभाग और आदिवासी विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रशासनिक स्तर पर इसे पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की पहल बताया जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर यह आदेश अब नई चर्चाओं और संदेहों को जन्म दे रहा है।

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जिले में लंबे समय से ऐसे कई मामले चर्चा में रहे हैं, जहां शिक्षक, सहायक शिक्षक और प्रधान पाठक मूल स्कूलों में नियमित अध्यापन कार्य किए बिना भी वेतन प्राप्त करते रहे। अब जब वेतन जारी करने से पहले संस्था प्रमुख से प्रमाण पत्र लेने की बात सामने आई है, तो सवाल उठ रहा है कि क्या वास्तव में निष्पक्ष जांच होगी या फिर संस्था प्रमुखों पर दबाव बनाकर फर्जी उपस्थिति प्रमाण पत्र जारी करवाए जाएंगे?

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शिक्षा जगत में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि जिन कर्मचारियों ने महीनों तक स्कूलों में उपस्थित होकर पढ़ाई नहीं कराई, उनके खिलाफ क्या विभागीय कार्रवाई होगी या पूरा मामला केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित रह जाएगा। कई स्कूलों में विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होने की शिकायतें पहले भी सामने आती रही हैं, लेकिन जिम्मेदारों पर ठोस कार्रवाई नहीं होने से व्यवस्था पर सवाल उठते रहे हैं।

मामले का सबसे जटिल पहलू उन प्रधान पाठकों को लेकर सामने आया है, जो स्वयं प्रभारी हॉस्टल अधीक्षक के रूप में पदस्थ हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि वे अपनी उपस्थिति और अध्यापन कार्य का प्रमाण पत्र आखिर किससे प्राप्त करेंगे? यदि संस्था प्रमुख स्वयं ही दूसरे प्रभार में हैं, तो सत्यापन की निष्पक्ष प्रक्रिया कैसे सुनिश्चित होगी?

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सूत्रों के अनुसार, कई संस्थाओं में वास्तविक उपस्थिति रजिस्टर और कागजी रिकॉर्ड में भारी अंतर होने की भी चर्चाएं हैं। यदि प्रशासन निष्पक्ष जांच कराए तो ऐसे मामलों में बड़ा खुलासा हो सकता है। वहीं शिक्षकों के एक वर्ग का कहना है कि दोहरी जिम्मेदारी देकर विभाग ने खुद ऐसी स्थिति पैदा की, जहां स्कूलों में शैक्षणिक व्यवस्था प्रभावित हुई।

अब निगाहें जिला प्रशासन और संबंधित विभागों पर टिकी हैं कि वे केवल प्रमाण पत्र लेने तक सीमित रहते हैं या वास्तव में उन कर्मचारियों पर कार्रवाई करेंगे जो बिना अध्यापन कार्य किए सरकारी वेतन लेते रहे। जिले में यह मामला अब शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक नियंत्रण की बड़ी परीक्षा बनता जा रहा है।

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